दिल्ली विश्वविद्यालय में चल रहे विवाद के बीच राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को कहा कि देश में असहिष्णुता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। उन्होंने विश्वविद्यालय परिसरों में स्वतंत्र चिंतन की वकालत करते हुए कहा कि यहां अशांति की संस्कृति बढ़ाने के बजाए तार्किक बहस होनी चाहिए।
राष्ट्रपति की यह टिप्पणी डीयू में आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन एबीवीपी और वामदल के आइसा के बीच जारी गतिरोध और छात्रा गुरमेहर कौर के हालिया ट्वीट के बाद छिड़ी बहस की पृष्ठभूमि में आई है। कोच्चि में छठे केएस राजामणि स्मारक पर आख्यान में राष्ट्रपति ने कहा कि यह देखना दुखद है कि छात्र हिंसा और अशांति के भंवर में फंसे हुए हैं। हमारे प्रमुख उच्चतर शिक्षण संस्थान ऐसे यान हैं, जिससे भारत अपने को ज्ञान समाज में स्थापित कर सकता है। शिक्षा के ऐसे मंदिरों में सृजनात्मकता और स्वतंत्र चिंतन की गूंज होनी चाहिए न कि अशांति और विवाद।
शोषण के प्रति आगाह किया
राष्ट्रपति ने समाज में फैल रहे ‘गलत बयानी’ शोषण और महिलाओं पर हमले के प्रति आगाह करते हुए कहा कि यह स्वतंत्र विचारों वाला देश है। यहां पुरातन काल से ही अपनी बात रखने का अधिकार रहा है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मूलभूत अधिकार
प्रणब मुखर्जी ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे संविधान में निहित सबसे महत्वपूर्ण मूलभूत अधिकार है। इसमें तर्कसंगत विवेचना और असहमति जताने का पूरी जगह है। जहां अलग-अलग विचारों के लोगों द्वारा स्वस्थ बहस के जरिये अपनी बात रखने की विशेषता रही है।