कहा जाता है की हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है। यह बहुत पुरानी कहावत है। किसी गाँव में एक सेठ जी रहते थे। सेठ जी को इस कहावत पर यकीन नहीं था। एक बार तो सेठ जी इसी बात पर एक साधू से बहस कर बैठे।
सेठ जी आँगन में बैठे कुछ दाने चबा रहे थे, तभी एक साधू वहाँ से गुजरा। उसने सेठ जी से कहा – “सेठ जी कुछ भिक्षा दे दीजिये।” सेठ जी बोले – “जाओ जाओ आगे बढ़ो।” साधू बोला – “में बहुत भूखा हूँ, खाने के लिए कुछ दाने ही दे दीजिये।” सेठ जी बोले – “दाने मुफ्त में नहीं मिलते, बच जाएंगे तो में तुम्हे दे दूंगा।” साधू बोला – “सेठ जी कोई आदमी सारे के सारे दाने नहीं खा सकता, हर एक दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है।” यह बात सुन कर सेठ जी को गुस्सा आ गया, वो बोले – “तुम अपने आपको कुछ ज्यादा ही अक़्लमंद समझते हो, अगर हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है तो बताओ मेरे हाथ में जो यह दाना है इस पर किसका नाम लिखा है ?” साधू ने कहा – “मुझे लगता है इस पर कौवे का नाम लिखा है, यह दाना कौवे का खाना है।” सेठ जी बोले – “देखो इसे मैं खाऊंगा, मुझे बताओ कहाँ है तुम्हारा कौवा ?” यह कह कर जैसे ही सेठ जी ने उस दाने को अपने मुंह में डाला तो सेठ जी को अचानक खांसी आ गई और वो दाना पेट में जाने के बजाय नाक में चला गया।
सेठ जी की सांस अटक गई। आस पास के लोग दौड़े आये और जल्दी से सेठ जी को डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने तुरंत एक चिमटी ली और सेठ जी की नाक में फंसा दाना निकाल कर फेंक दिया। तभी एक कौवा आया और उस दाने को चोंच में दबा कर उड़ गया। साधू भी वहीं था। वह बोला – “देखो सेठ जी उस दाने पर कौवे का ही नाम लिखा था।”