ये कहने की जरूरत नहीं कि प्राण साहब फिल्मी दुनिया की उन सबसे बुजुर्ग हस्तियों में से एक थे जो बॉलीवुड के बचपन से लेकर जवानी तक के सफर के गवाह रहे। इस लंबे फिल्मी सफर में प्राण ने दर्जनों यादगार फिल्में दीं। आइए नजर डालते हैं अलग-अलग दौर में आईं, उनकी दस बेमिसाल फिल्मों पर।
करीब 60 सालों के फिल्मी सफर में प्राण साहब ने साढ़े तीन सौ से भी ज्यादा फिल्म…

ये कहने की जरूरत नहीं कि प्राण साहब फिल्मी दुनिया की उन सबसे बुजुर्ग हस्तियों में से एक थे जो बॉलीवुड के बचपन से लेकर जवानी तक के सफर के गवाह रहे। इस लंबे फिल्मी सफर में प्राण ने दर्जनों यादगार फिल्में दीं। आइए नजर डालते हैं अलग-अलग दौर में आईं, उनकी दस बेमिसाल फिल्मों पर।
करीब 60 सालों के फिल्मी सफर में प्राण साहब ने साढ़े तीन सौ से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया जिनमें उन्होंने एक से बढ़कर एक किरदार निभाये। उनकी पचासों फिल्में के नाम लोगों को मुंहजुबानी याद हैं। ऐसे में उनकी दस चुनिंदा फिल्में तय कर पाना आसान नहीं। फिर भी अगर कामयाबी और अलग अलग किरदारों के पैमाने पर तोलें तो प्राण साहब की मकबूलियत की शुरुआत होती है, पचास के दशक से। मधुमति(1958)1958 की फिल्म मधुमति ने प्राण को सबसे बड़ा ब्रेकथ्रू दिया था। फिल्म में उनका किरदार था एक बदमिजाज ठाकुर का और उनके अपोजिट हीरो थे तब के सुपरस्टार दिलीप कुमार। मधुमति ने खलनायकी की दुनिया में प्राण का नाम हमेशा के लिए अमर कर दिया।
जिस देश में गंगा बहती है(1960)पचास और साठ के दशक में प्राण साहब की खलनायकी से सजी एक के बाद एक कई कामयाब फिल्में आईं, लेकिन जिस फिल्म ने उनके ग्रे शेड को पब्लिक की पसंद बना दी वो थी, राज कपूर की ‘जिस देश में गंगा बहती है’। 1960 में आई इस फिल्म में प्राण ने एक ऐसे डाकू का किरदार निभाया था, जिसका बाद में हृदय परिवर्तन हो जाता है और वो पूरी टोली के साथ सरेंडर कर देता है।
कश्मीर की कली(1964)दिलीप कुमार और राजकपूर के अलावा प्राण ने तब के डांसिंग स्टार शम्मी कपूर के साथ भी कई सुपरहिट फिल्में की। 1964 में रिलीज हुई फिल्म कश्मीर की कली भी उनमें से एक है। इस फिल्म में उनकी अनोखी स्मोकिंग स्टाइल और पहाड़ी जुबान में बोले गए डायलॉग्स काफी मशहूर हुए थे। राम और श्याम(1967)परदे पर बेरहम और क्रूर किरदार निभाने में प्राण का कोई सानी नहीं था। 1967 में आई फिल्म राम और श्याम में दिलीप कुमार का डबल रोल था, लेकिन पूरी फिल्म में जिस एक किरदार की मौजूदगी दर्शकों को डराती रही, वो प्राण साहब ही थे।
उपकार(1967)साठ का दशक खत्म होते-होते प्राण निर्विवाद रूप से बॉलीवुड के सबसे कामयाब खलनायक बन चुके थे, लेकिन जिस फिल्म ने उनकी पूरी छवि एक झटके में बदल दी, वो थी 1967 में रिलीज हुई फिल्म ‘उपकार’। अपाहिज मलंग चाचा के किरदार में प्राण ने ऐसा प्राण फूंका कि दुनिया देखती रह गई।
परिचय(1972)सत्तर का दशक आते-आते फिल्मी दुनिया में काफी कुछ बदल चुका था और उपकार की कामयाबी के बाद प्राण को खलनायक के सिवा भी अलग-अलग किरदार मिलने लगे थे। इसी दौरान गुलजार की बेहद चर्चित फिल्म परिचय में प्राण को दादाजी का रोल निभाने को मिला। बेहद अक्खड़ पर उसूलों के पक्के दादाजी के किरदार को प्राण ने ऐसी अदायगी दी जिसे देखकर आज भी आंखें भर आती हैं।
जंजीर(1973)फिल्मी दुनिया में सत्तर का दशक एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन के लिए जाना जाता है। उनकी पहली कामयाब फिल्म ‘जंजीर’ की आज भी चर्चा होती है, लेकिन इस फिल्म में बिग बी की जांबाजी और बहादुरी को जिसने बराबर का टक्कर दी वो था शेर खान यानी प्राण साहब। पठान के शानदार किरदार में उन्होंने सबका दिल जीत लिया।
धर्मवीर(1977)सन् 1977 में मनमोहन देसाई की कामयाब फिल्म ‘धर्मवीर’ यूं तो धर्मेंन्द्र और जीतेन्द्र की जोड़ी के लिए जानी जाती है, लेकिन उनके पिता के तौर पर प्राण साहब ने जिस शिकारी का किरदार निभाया, उसके बिना फिल्म की चर्चा मुमकिन नहीं। अपने दमदार संवाद और बेहतरीन अदायगी की बदौलत प्राण जब-जब फिल्म में नज़र आए, बस छा गए।
शराबी(1984)सुनहरे परदे पर तीन दशक गुजार लेने के बावजूद प्राण साहब की अदायगी की धार कभी कुंद नहीं पड़ी। 1984 में प्रकाश मेहरा की फिल्म शराबी में प्राण एक बार फिर एक ऐसे पिता के किरदार में थे, जो अपनी दौलत, शोहरत और उसूलों के लिए जीता है। हालांकि पूरी फिल्म अमिताभ के इर्द-गिर्द ही घूमती रही, बावजूद इसके प्राण ने अपनी अदाकारी से करोड़पति बिजनेसमैन के किरदार को लाजबाव बना दिया। सनम बेवफा(1990)नब्बे के दशक में भी प्राण का फिल्मी सफर बखूबी जारी रहा। पहले के मुकाबले उनकी मसरूफियत थोड़ी कम जरूर हो गई, पर अदाकारी के जलवे में कोई कमी नहीं आई। सावन कुमार की फिल्म ‘सनम बेवफा’ में उनका मुकाबला डैनी जैसे कुशल अभिनेता से था, पर परदे पर प्राण कहीं कमजोर नहीं पड़े और अपने किरदार को यादगार बना दिया।
दरअसल, प्राण साहब हर किरदार को दिल से निभाते थे। हर किरदार में अपने प्राण डाल देते थे, चाहे वो ‘जिस देश में गंगा बहती में राका डाकू का किरदार हो, ‘जंजीर’ का जान पर खेलने वाला शेरखान हो, ‘कालिया’ के सख्त जेलर साहब हों, ‘क्रोधी’ का वो पुजारी हो जो सच के सहारे समाज को बदलने की जंग लड़ता है, ‘शराबी’ बेटे की जिंदगी को पटरी पर लाने की कवायद रहते राय साहब हों, या दारू पीकर दंगा करने वाला ‘माइकल’ या फिर ‘सनम बेवफा’ के जिद्दी पिता, प्राण साहब के निभाये इन किरदारों और इन जैसे कई दूसरे किरदारों को भूल पाना मुश्किल है।