15 अगस्त के दिन देश आजाद हुआ था। आजादी के लिए कितने ही देशभक्तों ने कुर्बानियाँ दी हैं। हम भगवान को धन्यवाद दें और प्रार्थना करें कि ‘हम कदम-से-कदम मिलाकर चलें, विचार-से-विचार मिलाकर रहें और अपनी आत्मशक्ति को, श्रद्धाशक्ति को, कर्मशक्ति को विकसित करें।’

तब तो यह आजादी बरकरार रहेगी, वर्ना तो आजादी के उत्सव मना लिए। फूट डालनेवाले लोग हमें फिर से आपसी फूट का शिकार बनाकर हमारी आजादी छीन लें, यह ठीक नहीं। इस बात की सावधानी रखनी चाहिए।

आजादी का दिन प्रार्थना का दिन है, सावधानी का है, संयम, सदाचार, साहस और सद्विचार तथा सामर्थ्य बढ़ाने का संकल्प करने का है। एक आजादी है सामाजिक ढंग की और दूसरी है जीवात्मा को परमात्म प्राप्ति की। आप राजनैतिक और आत्मिक- दोनों आजादियां प्राप्त करने का उद्देश्य बना लें। इसके लिए शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक बल बढ़ाने हेतु शरीर स्वस्थ रहे, मन प्रसन्न रहे और बुद्धि में बुद्धिदाता के ज्ञान-ध्यान का प्रकाश हो जाए, यह अत्यंत आवश्यक है।

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वास्थ्य के नियम जान लें। अस्वस्थता अस्वाभाविक है, स्वास्थ्य स्वाभाविक है। अशांति अस्वाभाविक है, शांति और आनंद स्वाभाविक हैं। अज्ञान अस्वाभाविक है, ज्ञान स्वाभाविक है। तो जो स्वाभाविक है उसको पा लो और जो अस्वाभाविक है उसका रास्ता छोड़ दो। जैसे आवश्यक चीज स्वाभाविक मिल जाती है। श्वास अत्यंत आवश्यक हैं, स्वाभाविक मिल जाती हैं। पानी अत्यंत आवश्यक है, स्वाभाविक मिल जाता है।

ऐसे ही अन्तरात्मा का सुख अत्यंत आवश्यक है, छोटी-मोटी वासना और बेवकूफी छोड़ो तो स्वाभाविक मिल जायेगा। असाधन किया है इसीलिए साधन करने की जरूरत पड़ती है। बुरी आदतें हैं इसीलिए अच्छी आदतें डालने की जरूरत पड़ती है। बुरी आदतें छूट जाएं तो फिर अच्छी आदत का भी आग्रह नहीं।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्। (श्रीमद्भगवद्गीता – 18.5)

‘यज्ञ, दान और तप-ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करनेवाले हैं।’ यज्ञ, दान, तप करना चाहिए, इससे बुद्धि पवित्र होती है परंतु तब तक करना चाहिए जब तक मंजिल न मिल जाय। जैसे जब तक खोयी हुई चीज नहीं मिलती तब तक खोज चालू रखते हैं, जब तक किनारा नहीं मिलता तब तक नाव नहीं छोड़ते, ऐसे ही जब तक आत्मा का साक्षात्कार न हो तब तक यज्ञ, दान, तप आदि शुभ कर्म न छोड़ें, करते रहें और उन शुभ कर्मों के फल की आकांक्षा भी न करें।

तुच्छ मति के, छिछले मन के लोग जो भी सत्कर्म करते हैं उसके फल की इच्छा रखते हैं – ‘मैं दान करता हूँ, मेरा नाम हो जाय… मैं यज्ञ करता हूँ, मुझे यह (ऐहिक वस्तु) मिल जाय- वह मिल जाय…’ यह छिछले मन का संकल्प होता है कि ‘छोटा-सा कुछ कर्म करें और फल मिल जाय।’
जो शुभ कर्म तो तत्परता से करता है किंतु नश्वर की इच्छा नहीं रखता, शाश्वत को चाहता है उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और उसे परमात्मा की प्राप्ति होती है।

जो कर्म करके फल की इच्छा रखता है, उसको छिछले फल मिलते हैं, फिर नष्ट हो जाते हैं। इसलिए यज्ञ, दान और तप ईश्वरप्रीत्यर्थ, ईश्वरप्राप्त्यर्थ करें और उनके फल की आकांक्षा न रखें। इससे बुद्धि शुद्ध होगी, अंतःकरण पवित्र होगा और परमात्म-ज्ञान में गति होगी। कर्म भले आधिभौतिक हों, परंतु उन्हें ईश्वरप्रीत्यर्थ करने से मनुष्य आधिदैविक और आध्यात्मिक फल पाता है, इसे ‘धर्म’ कहा जाता है।

कर्म तो आधिदैविक करें, आध्यात्मिक करें और फल आधिभौतिक पाएं, इसे ‘धर्म’ नहीं कहा जाता। जैसे- तुलसी विष्णुप्रिया है, इसके पत्ते आधिभौतिक हैं। इन्हें अगर बीमारी मिटाने के भाव से खाएं तो धर्म नहीं होगा, आधिभौतिक का आधिभौतिक ही फायदा होगा। अगर तुलसी को प्रणाम करें, उसकी परिक्रमा करें, फिर उसके पत्ते भगवत्प्रसाद समझकर खाएं तो धर्म भी होगा और बीमारी भी मिटेगी।

गंगाजल को पानी मानकर पीएं तो धर्म नहीं होगा परंतु उसे भगवत्प्रसाद समझकर लें तो धर्म भी होगा और प्यास भी मिटेगी। हिन्दू धर्म की यह विशेषता है कि इसके अनुसार आपकी नजर बदल जाती है तो भोजन करना भी यज्ञ हो जाता है। पेड़ों को पानी देना, भूखे को रोटी देना, हारे हुए को हिम्मत देना भी यज्ञ है।

अशांत को शांति देना, निगुरे को सगुरा बनाना, अभक्त को भक्ति की तरफ ले जाना भी यज्ञ है और अपनी जो भी सूझबूझ है उसे परहित के लिए खर्चना यह यज्ञ, दान और तप है।

…तो स्वतंत्रता दिवस का यही संदेश है कि ‘आप आजादी की खुशियां मनाना चाहो तो भले मना लेना, परंतु खुशियां मनाने के साथ वह शाश्वत रहें ऐसी नजर रखना। देश को तोड़ने वाले तत्त्वों और अपने को गिराने वाले विकारों से बचना। ईश्वर-स्मरण व साधन-भजन इन्हीं की ओर लगना। भोग और मोक्ष अर्थात् ऐहिक आजादी और चौरासी लाख जन्मों के गर्भवास के कष्ट से आजादी, मुक्ति पा लें।
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आसारामजी आश्रम

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