आर्थिक विकास दर के ताजा आंकड़ों से साफ हो गया है कि अगले चुनाव बाद जिस भी पार्टी की सरकार बनेगी उसके समक्ष बदहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कठिन चुनौती होगी। ये आंकड़े यह भी बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती का घुन तमाम उम्मीदों से ज्यादा लग चुका है। दस वर्ष पहले राजग ने वर्ष 2004-05 में संप्रग को 7.5 फीसद की रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था सौंपी थी। वहीं, अगली सरकार को शायद ही पांच फीसद की विकास दर विरासत में मिल पाए।

विशेषज्ञों का कहना है कि अब देश में चुनावी माहौल बन चुका है। अगले तीन-चार महीनों तक अहम आर्थिक फैसलों की उम्मीद नहीं है। ऐसे में अर्थंव्यवस्था को और खराब दिन देखने पड़ सकते हैं। सीआइआइ के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी का कहना है कि पिछले कई तिमाहियों में पांच फीसद से कम की विकास दर यह साबित करती है कि सुस्ती हम सबकी उम्मीद से ज्यादा गहरी है। सरकार और उद्योग जगत ने दूसरी छमाही में हालात सुधरने की उम्मीद लगाई थी जो इन आंकड़ों को देखने के बाद गलत साबित हुए हैं।

जानकारों की मानें तो सरकार की तरफ से शुक्रवार को जारी आंकड़ों में कई बेचैन करने वाले तथ्य हैं। मसलन, पिछली तीन तिमाहियों में कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन की वजह से विकास दर 4.5 फीसद के करीब रह पाई थी। मगर अब इस क्षेत्र की रफ्तार भी घटती दिख रहा है। दो दिन पहले ही कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा था कि इस वर्ष सूखे का खतरा है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुताबिक बहुत अच्छे मानसून के बावजूद महज 3.6 फीसद की कृषि विकास दर निराशाजनक है। चालू वित्त वर्ष में पांच फीसद की विकास दर हासिल होती है या नहीं, यह पूरी तरह से अब जनवरी-मार्च, 2014 के दौरान रबी की पैदावार से तय होगी।

शायद यही वजह है कि फिक्की के अध्यक्ष सिद्धार्थ बिड़ला ने आने वाले दिनों में जीडीपी की विकास दर में और गिरावट की आशंका जताई है। उनका कहना है कि यह बहुत गंभीर स्थिति है जिससे आगामी सरकार को निपटना होगा। यह बेरोजगारी सहित कई तरह की समाजिक समस्याओं को जन्म देने की क्षमता रखती है।

By parshv