दूध के दांतों में कीड़ा, तो भी इलाज जरूरी

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बचपन में आने वाले दांतों को दूध के दांत कहते हैं। लोगों में यह भ्रांति होती है कि दूध के दांत एक समय के बाद गिरने लगते हैं इसलिए इनमें बीमारी होने या कीड़े आदि लगने पर इनका इलाज जरूरी नहीं होता। लेकिन उचित समय पर इलाज न कराने से दूध के दांतों के गिरने के बाद परमानेंट (स्थाई) दांत सही प्रकार से नहीं आ पाते और उनमें शुरू में ही तकलीफ होने लगती है।

टेढ़े-मेढ़े दांत

दूध के दांत आमतौर पर 6-12 वर्ष की आयु में एक-एक करके गिरते हैं और उनकी जगह परमानेंट दांत ले लेते हैं। किसी दांत में कीड़ा लग जाए और उसके गिरने का समय फिलहाल दूर हो तो ऎसे में दांत का इलाज न कराकर उसे निकाल दिया जाता है। लेकिन इस अवस्था में वह जगह खाली रह जाती है और टेढ़े-मेढ़े दांतों की समस्या होने लगती है। इसी वजह से आने वाले परमानेंट दांत अपनी सही जगह नहीं ले पाता है।

फिलिंग करवाएं

कई बार दूध के दांतों में कीड़ा लगने या कमजोर होने से इसका संक्रमण उसके नीचे उगने वाले परमानेंट दांत में भी पहुंचने की आशंका रहती है इसलिए कीड़ा लगने की समस्या होने पर दंत रोग विशेषज्ञ से सलाह लेकर दांत में फिलिंग करवाएं।

जांच जरूरी

यह भ्रम है कि रूट कैनाल ट्रीटमेंट बच्चों में नहीं करवाना चाहिए। ऎसे में जानकारी न होने से माता-पिता बच्चे के दूध के दांतों में परेशानी होने पर केवल दर्द निवारक दवाई दे देते हैं जिससे संक्रमण दांत के पल्प (नसों) तक पहुंच जाता है और डेंटल सेप्सिस (विषैले तत्व) बन जाती है। इसके लिए बच्चों के दांतों का रूट कैनाल ट्रीटमेंट करवाना चाहिए जो सामान्य प्रक्रिया है।

देखभाल करें

1. दांतों को किसी भी प्रकार की बीमारी से बचाने के लिए 6-12 वर्ष की उम्र के बीच कम से कम दो बार बच्चों को दंत रोग विशेषज्ञ को दिखाएं और परामर्श लें। यदि इस समस्या का समय पर इलाज न किया जाए तो दांत टेढ़े-मेढ़े हो सकते हैं या डेंटल ब्रेसिस या वायरिंग भी करवानी पड़ सकती है। जो एक लंबा और महंगा उपचार है।

2. माता-पिता को चाहिए कि वे बचपन से ही सुबह और रात को सोने से पहले बच्चों को ब्रश करवाएं व मीठा खाने के बाद कुल्ला करने की आदत डलवाएं।

3. दांतों की मजबूती के लिए विटामिन, कैल्शियम, मिनरल युक्त फल, हरी पत्तेदार सब्जियां व दूध लें।

4. मीठे और जंक फूड से परहेज करें। साथ ही हर छह माह में एक बार डॉक्टर से दांतों का चेकअप कराएं।