कुंभ मेले  में नागा साधु ही सबका आकर्षण बनेंगे. हर साल इन्‍हीं की सबसे ज्‍यादा चर्चा होती है.हो भी क्‍यों ना, आखिर इनका जीवन सबसे अलग जो होता है. इनका जीवन कई कठिनाईयों से भरा हुआ होता है. इन लोगों को दुनिया में क्‍या हो रहा है, इस बारे में इन्‍हें कोई मतलब नहीं होता.

इनके बारे में हर बात निराली होती है. जटाओं से लेकर शरीर पर भस्‍म तक, इनके जैसा कोई और नहीं दिखता. ये इतना कठिन जीवन जीते हैं जिसके बारे में आम लोग सोचते तक नहीं.

अगर कोई आम आदमी नागा साधु बनने के लिए जाता है, तो अखाड़ा उसके परिवार के बारे में पूछताछ करता है. इसके बाद उसे कठिन दौर से गुजरना होता है. ये परीक्षा केवल नागा साधु बनने तक की नहीं होती. एक बार नागा साधु बनने के बाद भी काफी मुश्किल भरा जीवन व्‍यतीत करना होता है. इसके कई नियम होते हैं.

नागा साधु को भस्म और रूद्राक्ष धारण करना आवश्‍यक होता है. यही वजह है कि अखाड़े में जो नागा साधु दिखते हैं, वे इसी रूप में दिखते हैं. रोज सुबह स्नान के बाद नागा साधु सबसे पहले शरीर पर भस्म रमाते हैं.

ये वस्‍त्र नहीं धारण कर सकते. अगर बहुत जरूरी हो तो तन पर केवल एक गेरुआ रंग का वस्‍त्र धारण करने की अनुमति होती है. साधु दिन में एक समय भोजन करते हैं. ये भोजन भिक्षा मांगकर एकत्रित किया हुआ होता है.

ये हमारी-आपकी तरह पलंग पर नहीं सोते. केवल जमीन पर सोने का नियम होता है. इस दौरान जमीन पर कुछ बिछाते भी नहीं. ये किसी से कोई मतलब नहीं रखते. ना ही किसी की निंदा, ना ही किसी की प्रशंसा.