आचार प्रथम धर्म है। बिना आचारों के हम किसी के जीवन में परिवर्तन की अपेक्षा नहीं रख सकते। हमारे अच्छे आचार ही सबको प्रभावित कर सकते हैं। आचार के बिना शिक्षा कभी आदर्श नहीं बनती। हर प्राणी के जीवन में आचार असरदार होता है।

यह बात राष्ट्रसंत विजय जयंतसेन सूरीश्वरजी ने बुधवार को जयंतसेन धाम में दर्शनार्थ आए नाहर कॉन्वेंट स्कूल के गुरुजन व देश के विभिन्न स्थानों के गुरुभक्तों से कही। उन्होंने कहा कि ज्ञान का यही लक्ष्य होना चाहिए हम इसकी शुरुआत हमारे जीवन से ही करें। हमारे अच्छे परिणाम ही हमारे संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को सन्मार्ग प्रदान करेंगे। आचार्य से धाणसा, बेंगलुरु, पुणे, टांडा, जालौर और भाबरा आदि श्रीसंघ के सदस्यों ने दर्शन-वंदन कर आशीर्वाद लिया। चातुर्मास आयोजक व राज्य योजना आयोग उपाध्यक्ष चेतन्य काश्यप परिवार की तेजकुंवरबाई काश्यप का इनरव्हील क्लब और श्री पार्श्वनाथ जैन महिला मंडल टीआईटी रोड की सदस्य ने अभिनंदन किया। दादा गुरुदेव की आरती का लाभ श्री त्रिस्तुतिक जैन संघ धाणसा ने लिया।

हनुमान और श्रीराम को बनाएं आदर्श- मुनिराज
मुनिराज निपुणर विजयजी ने श्रद्धालुओं को हनुमान और श्रीराम को आदर्श बनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा शादी से पहले हनुमान जैसा ब्रह्मचर्य और शादी के बाद श्रीराम जैसा संयम जीवन में होना चाहिए। इन आदर्शों को आचरण में लाने वाले का जीवन सार्थक होता है। उन्होंने कहा कि धर्म के आलंबन से ही संसार के बंधनों से मुक्त हुआ जा सकता है। मोक्ष के चार दुर्लभ अंग मनुष्य जीवन, धर्म श्रवण, श्रद्धा तथा संयम प्राप्ति है।

By parshv