नर्मदा की लहर और अहिल्यादेवी के किले की मेहराब का संगम महेश्वर के घाट से चलकर साडियों में उतर आया है। महेश्वर साडियों पर उकेरी गई डिजाईन के बाद निर्मित साड़ी आकर्षण का केन्द्र बन जाती है। ऐसी ही एक कला ओर है। हिमाचल प्रदेश का फर मलमली, कम वजन का, गरम तथा आकर्षक होता है। इसी फर में महिलाओं के लिए सिर से लेकर पांव तक के सामान बनाने का हुनर इंदौर की महिला उद्यमी ने दिखाया है।

मेला प्रभारी दिलीप सोनी के अनुसार म.प्र. हस्तशिल्प एवं हाथकरघा विकास निगम का प्रयास है कि प्रदेश की विभिन्न क्षेत्रों में बिखरी कला को आम कला प्रेमी जनता तक पहुंचाया जाए। इसी क्रम में निगम ने नामी शिल्पियों को लेकर हस्तशिल्प मेले का आयोजन रतलाम रोटरी हाल में किया है। इसमें सभी सामग्री हाथ से बनी हुई है। इसमें स्वास्थ्य, सौदर्य के साथ पर्यावरण संरक्षण भी जुडा हुआ है। मप्र में नर्मदा का प्रमुख घाट महेश्वर में है। अहिल्याबाई का किला नर्मदा के किनारे हैं। किले की मेहराब बहुत ही आकर्षक है और इसी मेहराब को साडी बुनकरों ने आधार बनाकर शुद्ध कॉटन और सिल्क की साड़ी का निर्माण किया। साडी की पूरी बार्डर पर किले की नक्काशी को बहुत ही सुंदर ढंग से बनाने के कारण ही पूरे देश में महेश्वर की साड़ियों प्रसिद्ध हो गई है।

मेले में महेश्वर से विभिन्न प्रकार और डिजाईन की साडियां लेकर आए रवि चौहान के अनुसारं चैन्नई, बैंगलोर, चंडीगढ़, गोवा, नासिक, पूना, मुंबई, अहमदाबाद, बडौदा, सूरत, नसिक जैसे शहरों में महेश्वरी की साडियों की खूब मांग है। रतलाम में यह पहला मौका है जब महेश्वरी साडियां आई है। फिल्म इंडस्ट्री की कई एक्ट्रेस इस साडी को पसंद करती है। इसमें सिल्का का ताना और काटन का बाना होता है। इसमें नर्मदा लहर के अलावा, बगदवी, तीन किला, रूई फूल, चटाई, शक्करपारा सहित कई डिजाईन पसंद की जाती है। मेला सुबह 11 बजे से रात्रि 9 बजे तक आम जनता के लिए खुला है और शिल्पी अपनी सामग्री के विक्रय और प्रदर्शन के लिए तत्समय तैयार है।