मोक्ष प्राप्ति के लिए मन में करुणा, वात्सल्य और मैत्री का भाव होना चाहिए -डाॅ. श्री शिवमुनिजी

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साधु बन जाओ, तपस्या कर लो, क्रिया पाल लो, उससे मोक्ष प्राप्त नहीं होगा, मोक्ष प्राप्ति के लिए मन में करुणा, वात्सल्य और मैत्री का भाव होना चाहिए। केवल महावीर का नाम या संतों के नाम रटने से उद्धार नहीं होगा। संत तो केवल निमित्त मात्र होते हैं, पुरुषार्थ तो स्वयं करना पड़ता है। स्वयं भगवान महावीर स्वामी भी अपने परम शिष्य गौतम स्वामी का कल्याण नहीं कर सके।

उन्होंने कहा अपना कल्याण चाहते हो तो मोह का त्याग कर स्वयं पुरुषार्थ करें। कोई किसी का संत नहीं, कोई किसी का श्रावक नहीं, सब भगवान महावीर के अनुयायी हैं फिर क्यों संतों के नाम से रोटी सेंकते हो। मन में राग-द्वेष करोगे तो उसका भुगतान कहां करोगे। प्रेम से बढ़कर दुनिया में कोई वस्तु नहीं है। सबका भला हो, सबका मंगल हो, की भावना से कार्य करें, कटुता से केवल दूरियां बढ़ती हैं। यह बात श्रमण संघीय आचार्य सम्राट डाॅ. श्री शिवमुनिजी ने नीमचौक स्थानक पर धर्मसभा में कही।

हमें कर्मों के बंधन से मुक्ति की युक्ति सीखना चाहिए
गुरुदेव श्रमण संघीय मंत्री शिरीष मुनि ने कहा आचार्य भगवंत आए हैं, कल प्रवचन के बाद विहार करके चले जाएंगे। आप उनसे क्या पाएंगे। आपको अपने जीवन में क्या चाहिए। रतलाम में तो सेंव, साड़ी और सोना बहुत प्रसिद्ध है और आपके पास बहुत है लेकिन हमें आचार्य भगवंत से क्या चाहिए। आचार्य श्री शांति और मैत्री का संदेश लेकर आए हैं, हमें नए कर्मों का बंधन न हो, पुराने कर्मों के बंधन से मुक्त हो, ऐसी विधि हमें सीखना है। वसुदेव कुटुंब की भावना को वापस लाना है। प्रत्येक जीव सुखी हो, ऐसी भावना रखना है। पहले खेती करने वाला सबका ध्यान रखता था, आज पूंजीपतियों के हाथों में व्यवस्था हो गई है। आज अहिंसक लोग सबसे ज्यादा भ्रूण हत्या कर रहे हैं। तुम किसी के पालन हार नहीं हो, सब अपना पुण्य लेकर आते हैं, तुम उसको मारने वाले कौन होते हो, जीवन में विवेक रखो।